आँख प्यासी है कोई मन्ज़र दे - aankh pyaasee hai koee manzar de - Dr. Rahat “ Indauri” - डॉ० राहत “इन्दौरी”

आँख प्यासी है कोई मन्ज़र दे,
इस जज़ीरे को भी समन्दर दे|

अपना चेहरा तलाश करना है,
गर नहीं आइना तो पत्थर दे|

बन्द कलियों को चाहिये शबनम, 
इन चिराग़ों में रोशनी भर दे|

पत्थरों के सरों से कर्ज़ उतार,
इस सदी को कोई पयम्बर दे|

क़हक़हों में गुज़र रही है हयात,
अब किसी दिन उदास भी कर दे|

फिर न कहना के ख़ुदकुशी है गुनाह,
आज फ़ुर्सत है फ़ैसला कर दे|

Dr. Rahat “ Indauri” - डॉ०  राहत “इन्दौरी”   

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