लब तिश्न-ओ-नोमीद हैं हम अब के बरस भी - lab tishn-o-nomeed hain ham ab ke baras bhee --Ahamad Faraz - अहमद फ़राज़

लब[1] तिश्न-ओ-नोमीद[2] हैं हम अब के बरस भी
ऐ ठहरे हुए अब्रे-करम[3] अब के बरस भी

कुछ भी हो गुलिस्ताँ[4] में मगर कुंजे- चमन [5] में
हैं दूर बहारों के क़दम अब के बरस भी 

ऐ शेख़-करम[6]! देख कि बा-वस्फ़े-चराग़ाँ[7] 
तीरा[8] है दरो-बामे-हरम[9] अब के बरस भी

ऐ दिले-ज़दगान[10] मना ख़ैर, हैं नाज़ाँ[11] 
पिंदारे-ख़ुदाई[12] पे सनम[13] अब के बरस भी

पहले भी क़यामत[14] थी सितमकारी-ए-अय्याम[15] 
हैं कुश्त-ए-ग़म [16] कुश्त-ए-ग़म अब के बरस भी

लहराएँगे होंठों पे दिखावे के तबस्सुम[17] 
होगा ये नज़ारा[18] कोई दम[19] अब के बरस भी

हो जाएगा हर ज़ख़्मे-कुहन [20] फिर से नुमायाँ[21] 
रोएगा लहू दीद-ए-नम[22] अबके बरस भी

पहले की तरह होंगे तही[23] जामे-सिफ़ाली[24] 
छलकेगा हर इक साग़रे-जम[25] अब के बरस भी

मक़्तल[26] में नज़र आएँगे पा-बस्त-ए-ज़ंजीर[27] 
अहले-ज़रे-अहले-क़लम[28] अब के बरस भी

शब्दार्थ
 होंठ
 प्यासा और निराश
 दया के बादल
 उद्यान
 उद्यान के कोने में
 ईश्वर
 बावजूद
 अँधेरा
 काबे के द्वार व छत
 आहत हृदय
 गर्वान्वित
 ईश्वरीय गर्व
 मूर्तियाँ
 प्रलय, मुसीबत
 समय का अत्याचार
 दुख के मारे हुए
 मुस्कुराहटें
 दृश्य
 कुछ समय
 गहरा घाव
 सामने आएगा
 भीगे नेत्र
 ख़ाली
 मिट्टी के मद्य-पात्र
 जमशेद नामी जादूगर का मद्यपात्र
 वध-स्थल
 बेड़ियों में जकड़े पैर
 विद्वान व लेखक

-Ahamad Faraz - अहमद फ़राज़ 

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