लोग हर मोड़ पे रुक-रुक के संभलते क्यों हैं - log har mod pe ruk-ruk ke sambhalate kyon hain - Dr. Rahat “ Indauri” - डॉ० राहत “इन्दौरी”

लोग हर मोड़ पे रुक-रुक के संभलते क्यों हैं
इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यों हैं

मैं न जुगनू हूँ, दिया हूँ न कोई तारा हूँ
रोशनी वाले मेरे नाम से जलते क्यों हैं

नींद से मेरा त'अल्लुक़ ही नहीं बरसों से
ख्वाब आ आ के मेरी छत पे टहलते क्यों हैं

मोड़ होता है जवानी का संभलने के लिए
और सब लोग यहीं आके फिसलते क्यों हैं

Dr. Rahat “ Indauri” - डॉ०  राहत “इन्दौरी”   

Comments