रोज़ तारों को नुमाइश में खलल पड़ता हैं -roz taaron ko numaish mein khalal padata hain : Dr. Rahat Indauri डॉ० राहत इन्दौरी

रोज़ तारों को नुमाइश में खलल पड़ता हैं  चाँद पागल हैं अंधेरे में निकल पड़ता हैं   मैं समंदर हूँ कुल्हाड़ी से नहीं कट सकता कोई फव्वारा नही हूँ जो उबल पड़ता हैं   कल वहाँ चाँद उगा करते थे हर आहट पर अपने रास्ते में जो वीरान महल पड़ता हैं   ना त-आरूफ़ ना त-अल्लुक हैं मगर दिल अक्सर नाम सुनता हैं तुम्हारा तो उछल पड़ता हैं   उसकी याद आई हैं साँसों ज़रा धीरे चलो धड़कनो से भी इबादत में खलल पड़ता हैं 

डॉ० राहत इन्दौरी 

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