तपा कर इल्म की भट्टी में बालातर बनाता हूँ -tapa kar ilm kee bhattee mein baalaatar banaata hoon - आदिल रशीद- aadil rasheed
तपा कर इल्म की भट्टी में बालातर बनाता हूँ
जो सीना चीर दें ज़ुल्मत का वो खंजर बनाता हूँ
मैं दरया हूँ मिरा रुख मोड़ दे ये किस में हिम्मत है
मैं अपनी राह चट्टानों से टकराकर बनाता हूँ
जहाँ हर सम्त मकतल कि फज़ाएँ रक्स करती हैं
उसी बस्ती में बच्चों के लिए इक घर बनाता हूँ
किसी ने झाँक कर मुझ में मेरी अजमत न पहचानी
मैं हूँ वो सीप जो इक बूँद को गोहर बनाता हूँ
अलग है बात अब तक कामयाबी से मैं हूँ महरूम
भुलाने के तुझे मन्सूबे मैं अक्सर बनाता हूँ
- आदिल रशीद- aadil rasheed

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