मिसाल इसकी कहाँ है ज़माने में - misaal isakee kahaan hai zamaane mein - - जावेद अख्तर - Javed Akhtar

मिसाल इसकी कहाँ है ज़माने में
कि सारे खोने के ग़म पाये हमने पाने में

वो शक्ल पिघली तो हर शै में ढल गई जैसे
अजीब बात हुई है उसे भुलाने में

जो मुंतज़िर[1] न मिला वो तो हम हैं शर्मिंदा
कि हमने देर लगा दी पलट के आने में

लतीफ़[2] था वो तख़य्युल[3] से, ख़्वाब से नाज़ुक
गँवा दिया उसे हमने ही आज़माने में

समझ लिया था कभी एक सराब[4] को दरिया
पर एक सुकून था हमको फ़रेब खाने में

झुका दरख़्त हवा से, तो आँधियों ने कहा
ज़ियादा फ़र्क़ नहीं झुक के टूट जाने में


- जावेद अख्तर - Javed Akhtar

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