कभी कभी लैम्प पोस्ट के नीचे कोई लड़का - kabhee kabhee laimp post ke neeche koee ladaka- गुलजार - Gulzar -Poem Gazal Shayari

कभी कभी लैम्प पोस्ट के नीचे कोई लड़का
दबा के पैन्सिल को उंगलियों में
मुड़े-तुड़े काग़ज़ों को घुटनों पे रख के
लिखता हुआ नज़र आता है कहीं तो..
ख़याल होता है, गोर्की है!
पजामे उचके ये लड़के जिनके घरों में बिजली नहीं लगी है
जो म्यूनिसपैल्टी के पार्क में बैठ कर पढ़ा करते हैं किताबें
डिकेन्स के और हार्डी के नॉवेल से गिर पड़े हैं...
या प्रेमचन्द की कहानियों का वर्क है कोई, चिपक गया है
समय पलटता नहीं वहां से
कहानी आगे बढ़ती नहीं है... और कहानी रुकी हुई है।

ये गर्मियाँ कितनी फीकी होती हैं - बेस्वादी।
हथेली पे लेके दिन की फक्की
मैं फाँक लेता हूं...और निगलता हूं रात के ठन्डे घूंट पीकर
ये सूखा सत्तू हलक से नीचे नहीं उतरता

ये खुश्क़ दिन एक गर्मियों का
जस भरी रात गर्मियों की

गुलजार - Gulzar

-Poem Gazal Shayari

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