वो ख़त के पुरज़े उड़ा रहा था - wo khat ke puraze uda raha tha - गुलजार - Gulzar -Poem Gazal Shayari
वो ख़त के पुरज़े उड़ा रहा था
हवाओं का रुख़ दिखा रहा था
कुछ और भी हो गया नुमायाँ
मैं अपना लिखा मिटा रहा था
उसी का इमान बदल गया है
कभी जो मेरा ख़ुदा रहा था
वो एक दिन एक अजनबी को
मेरी कहानी सुना रहा था
वो उम्र कम कर रहा था मेरी
मैं साल अपने बढ़ा रहा था
गुलजार - Gulzar
-Poem Gazal Shayari
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