एक बूढ़ा नहीफ़-ओ-खस्ता दराज़ - ek boodha naheef-o-khasta daraaz - अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari
एक बूढ़ा नहीफ़-ओ-खस्ता दराज़
इक ज़रूरत से जाता था बाज़ार
ज़ोफ-ए-पीरी से खम हुई थी कमर
राह बेचारा चलता था रुक कर
चन्द लड़कों को उस पे आई हँसी
क़द पे फबती कमान की सूझी
कहा इक लड़के ने ये उससे कि बोल
तूने कितने में ली कमान ये मोल
पीर मर्द-ए-लतीफ़-ओ-दानिश मन्द
हँस के कहने लगा कि ए फ़रज़न्द
पहुँचोगे मेरी उम्र को जिस आन
मुफ़्त में मिल जाएगी तुम्हें ये कमान
अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"
Poem Gazal Shayari

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