माँझी, मत हो अधिक अधीर - maanjhee, mat ho adhik adheer -sachchidanand hiranand vatsyayan "agay"- सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय" #Poem Gazal Shayari

1

माँझी, मत हो अधिक अधीर।
साँझ हुई सब ओर निशा ने फैलाया निडाचीर,
नभ से अजन बरस रहा है नहीं दीखता तीर,
किन्तु सुनो! मुग्धा वधुओं के चरणों का गम्भीर

किंकिणि-नूपुर शब्द लिये आता है मन्द समीर।
थोड़ी देर प्रतीक्षा कर लो साहस से, हे वीर-
छोड़ उन्हें क्या तटिनी-तट पर चल दोगे बेपीर?
माँझी, मत हो अधिक अधीर।

2


छोड़ दे, माँझी! तू पतवार।
आती है दुकूल से मृदुल किसी के नूपुर की झंकार,
काँप-काँप कर 'ठहरो! ठहरो!' की करती-सी करुण पुकार
किन्तु अँधेरे में मलिना-सी, देख, चिताएँ हैं उस पार

मानो वन में तांडव करती मानव की पशुता साकार।
छोड़ दे, माँझी! तू पतवार।
जाना बहुत दूर है पागल-सी घहराती है जल-धार,
झूम-झूम कर मत्त प्रभंजन करता है भय का संचार

पर मीलित कर आँखों को तू तज दे जीवन के आधार-
ऊषा गगन में नाच रही होगी जब पहुँचेंगे उस पार!
छोड़ दे, माँझी! तू पतवार।

sachchidanand hiranand vatsyayan "agay"- सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय"

#Poem Gazal Shayari

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