लाल हरे पीले टापुओं की तरह - laal hare peele taapuon kee tarah - - उत्पल बैनर्जी - Utpal Banerjee #www.poemgazalshayari.in

लाल हरे पीले टापुओं की तरह
होते थे बर्फ़ के लड्डू
बचपन के उदास मौसम में
खिलते पलाश की तरह।

सुर्ख़ रंगों के इस पार से
बहुत रंगीन दिखती थी दुनिया
हालाँकि उस पार का यथार्थ बहुत बदरंग हुआ करता था,
गर्दन तिरछी कर जब हम लड्डू चूसते
तो माँ हमें कान्हा पुकारती
तब पैसों की बहुत किल्लत थी
और बमुश्किल एक लड्डू मिल पाता था
जिसे हम बहुत धीरे-धीरे चूसते
तो लड्डूवाला कह उठता -- बाबू, लड्डू बहा जा रहा है,
और सचमुच हम पाते कि
हमारे तिरंगे की त्रिवेणी कोहनी से बही जा रही है
हम तेज़ी से सोख लेते सारा रंग
तो छोटा-सा हिमालय उभर आता
हमारे फूल तितली और पतंगों के सपनों में
अकसर एक सपना लड्डुओं का भी शामिल हो जाया करता था
जहाँ बर्फ़ के पेड़ों पर लड्डुओं के फूल खिला करते थे।

लेकिन समय के साथ धूमिल होते गए रंग
जगमग दुकानों में अब
खनकने लगी हैं शीतल पेय की बोतलें
बर्फ़ की यह छोटी-सी दुनिया
धीरे-धीरे ओझल होती चली गई है
लड्डुओं के साथ ही ओझल हो गए वे क़िस्से
जिनमें एक दिन लड्डूवाले ने बताया था कि
किस तरह धरती और सूरज ने लड्डुओं से
चुरा लिया था हरा और लाल रंग!

अब अपने बच्चों के संग
कोल्ड-ड्रिंक्स पीते हैं हम
और जब कसैली डकार तार-तार कर देती है गले को
बरबस हमें याद आ जाते हैं
बर्फ़ के लड्डू!

 - उत्पल बैनर्जी - Utpal Banerjee
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