रिस रहा है घाव कोई, ज़िन्दगी की शर्त पर - ris raha hai ghaav koee, zindagee kee shart par -- जयप्रकाश त्रिपाठी- Jayprakash Tripathi #www.poemgazalshayari.in ||Poem|Gazal|Shaayari|Hindi Kavita|Shayari|Love||

रिस रहा है घाव कोई, ज़िन्दगी की शर्त पर।
कुतरता है पाँव मेरे यह अभावों का सफ़र।

कर नहीं पाया अभी तक रिश्ते-नातों का हिसाब,
उधर कितने लोग हैं, कितना अकेलापन इधर।

रोज़ क्यों लगता है कि मंज़िल खड़ी है सामने
और बाक़ी रह गया है फ़ासला बस हाथ-भर।

बिखरने के डर से क्यों ऐसे सहेजा स्वयं को,
रेत के मानिन्द साबुत रह गया सब टूटकर।

बून्द-भर भी पता होता काश सच के मायने,
नहीं होती आँसुओं में दर्द की ऐसी लहर।

- जयप्रकाश त्रिपाठी- Jayprakash Tripathi

#www.poemgazalshayari.in

||Poem|Gazal|Shaayari|Hindi Kavita|Shayari|Love||

Comments