सखि! रघुनाथ-रूप निहारु - sakhi! raghunaath-roop nihaaru -- तुलसीदास- Tulsidas #www.poemgazalshayari.in ||Poem|Gazal|Shayari|Hindi Kavita|Shayari|Love||

सखि! रघुनाथ-रूप निहारु।
सरद-बिधु रबि-सुवन मनसिज-मानभंजनिहारु॥
स्याम सुभग सरीर जनु मन-काम पूरनिहारु।
चारु चंदन मनहुँ मरकत सिखर लसत निहारु॥
रुचिर उर उपबीत राजत, पदिक गजमनिहारु।
मनहुँ सुरधनु नखत गन बिच तिमिर-भंजनिहारु॥
बिमल पीत दुकूल दामिनि-दुति, बिनिंदनिहारु।
बदन सुखमा सदन सोभित मदन-मोहनिहारु॥
सकल अंग अनूप नहिं कोउ सुकबि बरननिहारु।
दास तुलसी निरखतहि सुख लहत निरखनिहारु॥

- तुलसीदास- Tulsidas

#www.poemgazalshayari.in

||Poem|Gazal|Shayari|Hindi Kavita|Shayari|Love||

Comments

Popular posts from this blog

Music Distribution क्या है? Music Distribution कैसे किया जाता है? Free और Paid Music Distribution Platforms की पूरी जानकारी

गैस की कमी में खाना बनाने के 20+ स्मार्ट तरीके | Complete Guide for Smart Cooking Article Ambika Rahee

प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना (PM Vishwakarma Yojana) – पूरा प्रोसेस, ट्रेनिंग, टूल्स और फायदे