इक रात में सौ बार जला और बुझा हूँ - ik raat mein sau baar jala aur bujha hoon -नज़ीर बनारसी - Nazir Banarsi

 इक रात में सौ बार जला और बुझा हूँ

मुफ़लिस का दिया हूँ मगर आँधी से लड़ा हूँ


जो कहना हो कहिए कि अभी जाग रहा हूँ

सोऊँगा तो सो जाऊँगा दिन भर का थका हूँ


कंदील समझ कर कोई सर काट न ले जाए

ताजिर हूँ उजाले का अँधेरे में खड़ा हूँ


सब एक नज़र फेंक के बढ़ जाते हैं आगे

मैं वक़्त के शोकेस में चुपचाप खड़ा हूँ


वो आईना हूँ जो कभी कमरे में सजा था

अब गिर के जो टूटा हूँ तो रस्ते में पड़ा हूँ


दुनिया का कोई हादसा ख़ाली नहीं मुझसे

मैं ख़ाक हूँ, मैं आग हूँ, पानी हूँ, हवा हूँ


मिल जाऊँगा दरिया में तो हो जाऊँगा दरिया

सिर्फ़ इसलिए क़तरा हूँ कि मैं दरिया से जुदा हूँ


हर दौर ने बख़्शी मुझे मेराजे मौहब्बत

नेज़े पे चढ़ा हूँ कभी सूलह पे चढ़ा हूँ


दुनिया से निराली है 'नज़ीर' अपनी कहानी

अंगारों से बच निकला हूँ फूलों से जला हूँ



नज़ीर बनारसी - Nazir Banarsi


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