मेरे मन के आसमान में पंख पसारे - mere man ke aasamaan mein pankh pasaare -फणीश्वर नाथ रेणु - Phanishwar Nath Renu

 मेरे मन के आसमान में पंख पसारे

उड़ते रहते अथक पखेरू प्यारे-प्यारे!

मन की मरु मैदान तान से गूँज उठा

थकी पड़ी सोई-सूनी नदियाँ जागीं

तृण-तरू फिर लह-लह पल्लव दल झूम रहा

गुन-गुन स्वर में गाता आया अलि अनुरागी

यह कौन मीत अगनित अनुनय से

निस दिन किसका नाम उतारे!

हौले, हौले दखिन-पवन-नित

डोले-डोले द्वारे-द्वारे!

बकुल-शिरिष-कचनार आज हैं आकुल

माधुरी-मंजरी मंद-मधुर मुस्काई

क्रिश्नझड़ा की फुनगी पर अब रही सुलग

सेमन वन की ललकी-लहकी प्यासी आगी

जागो मन के सजग पथिक ओ!

अलस-थकन के हारे-मारे

कब से तुम्हें पुकार रहे हैं

गीत तुम्हारे इतने सारे!


फणीश्वर नाथ रेणु - Phanishwar Nath Renu


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