राजगोपाल सिंह का जीवन परिचय | Rajgopal Singh
राजगोपाल सिंह का जीवन परिचय | Rajgopal Singh
राजगोपाल सिंह का जन्म 1 जुलाई 1947 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर ज़िले में हुआ।
आपकी रचनाओं में परिवारिक संबंधों की संवेदना और प्रकृति प्रेम विशेषत: देखने को मिलते हैं।
आपके दोहों व गीतों में कहीं 'बाबुल' का उल्लेख है तो कहीं 'फ़सल'! यदि दोहों पर ध्यान दें तो राजगोपाल जी कहीं महानगर के अशांत जीवन पर व्यंगबाण छोड़ते दिखते है:
'अद्भुत है, अनमोल है, महानगर की भोर
रोज़ जगाए है हमें, कान फोड़ता शोर'
तो कहीं रोटी की खातिर इनसान कैसे जीवन निर्थक बना लेता है कि ओर भी ध्यान दिलाते है:
'रोटी-रोज़ी में हुई, सारी उम्र तमाम
कस्तूरी लम्हे हुए, बिना-मोल निलाम'
आपके तरन्नुम भरे दोहे और गीत श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देते हैं।
आपके अनेक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं और अब तो आपकी ऑडियो सी डी उपलब्ध हैं।
राजगोपाल सिंह | दोहे
बाबुल अब ना होएगी, बहन भाई में जंग
डोर तोड़ अनजान पथ, उड़कर चली पतंग
बाबुल हमसे हो गई, आख़िर कैसी भूल
क्रेता की हर शर्त जो, तूने करी कबूल
धरती या कि किसान से, हुई किसी से चूक
फ़सल के बदले खेत में, लहके है बंदूक
मौन ओढ़े हैं सभी | राजगोपाल सिंह का गीत
मौन ओढ़े हैं सभी तैयारियाँ होंगी ज़रूर
राख के नीचे दबी चिंगारियाँ होंगी ज़रूर
आज भी आदम की बेटी हंटरों की ज़द में है
हर गिलहरी के बदन पर धारियाँ होंगी ज़रूर
नाम था होठों पे सागर, पर मरुस्थल की हुई
उस नदी की कुछ-न-कुछ लाचारियाँ होंगी ज़रूर
महानगर पर दोहे
अद्भुत है, अनमोल है, महानगर की भोर
रोज़ जगाता है हमें, कान फोड़ता शोर
अद्भुत है, अनमोल है, महानगर की शाम
लगता है कि अभी-अभी, हुआ युद्ध विश्राम
अद्भुत है अनमोल है, महानगर की रात
दूल्हा थानेदार है, चोरों की बारात
सीते! मम् श्वास-सरित सीते
सीते! मम् श्वास-सरित सीते
रीता जीवन कैसे बीते
हमसे कैसा ये अनर्थ हुआ
किसलिये लड़ा था महायुद्ध
सारा श्रम जैसे व्यर्थ हुआ
पहले ही दुख क्या कम थे सहे
दो दिवस चैन से हम न रहे
सीते! मम् नेह-निमित सीते
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