मुझ मिटटी को घोलकर समंदर बनाया है | अम्बिका राही - Ambika Rahee

प्रिय देवी जी,

हर जगह आपका होना,
महसूस कर पा रहा हूँ,
धीरे- धीरे मेरे रूह में घुलते जा रहे हो,
जैसे धीरे-धीरे पानी में चीनी घुलती है |
और देख पा रहा हूँ,
आपका प्रतिविम्ब होता जा रहा हूँ |

महसूस कर पा रहा हूँ,
उन हवाओं को,
जो आपकी तरफ से होकर आ रही है|
उनमें आपके होने की खबर मौजूद है,
मैं महसूस कर पा रहा हूँ आपकी दिव्यता,
आपके स्वाभिमान, आपके समर्पण को,
आपकी सादगी और आपके प्यार को|

हम कृतज्ञ है,
जो राही को अपना माना है,
मुझ मिटटी को घोलकर समंदर बनाया है |

कविता@अम्बिका राही

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